नई दिल्ली. युके के पांच यूनिवर्सिटीज के डॉक्टरों की टीम ने मिलकर एचआइवी जैसी भयानक वायरस को इंसान के शरीर से जड़ से साफ करने के लिए एक मेडिकल ट्रायल का आयोजन किया। जिसमें इंग्लैंड के एक 44 साल के व्यक्ति का एचआईवी एड्स का इलाज किया गया। शायद इतिहास में यह पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जिनके पूरे शरीर से इस एड्स वायरस का सफाया कर दिया गया।
एड्स से पीड़ित मरीज लंदन में कथित तौर पर एक 'सामाजिक कार्यकर्ता' है। नए रिसर्च पर काम कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है वैसे तो इस तरह के वायरस से निजात दिलाने वाली थैरेपी पहले से ही मौजूद है लेकिन इस नए रिसर्च में थैरेपी को थोड़ा इलग तरह से डिजाइन किया जा रहा है जिसमें रोगी के शरीर से इस वायरस को नष्ट किया जा सके।
प्रोफेसर सारा फिडलर ने बताया कि इस वायरस के लिए हाल ही में जिस एंटी-रेट्रोवियाल थैरेपी का इस्तेमाल किया जाता है उसका मुख्य लक्ष्य सिर्फ शरीर में मौजूद टी-कोशिकाओं को ठीक करना है जो इस वायरस की वजह से संक्रमित हो जाते हैं। लेकिन इससे शरीर से वायरस पूरी तरह से नहीं हट पाता है। इसलिए इस नए थैरेपी का निर्माण किया गया जिससे इस वायरस से संक्रमित मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकें।
बता दें कि यह नई थैरेपी दो स्टेज में काम करती है। पहले यह शरीर में मौजूद एचआईवी संक्रमित कोशिकाओं की पहचान करती है। दूसरा यह एक दवा वैरिनोस्टाट के रूप में जाना जाता है जो कि निष्क्रिय टी-कोशिकाओं को सक्रिय करता है। इस तरह यह इम्यून सिस्टम को इस वायरस से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
COURTESY... U C NEWSएड्स से पीड़ित मरीज लंदन में कथित तौर पर एक 'सामाजिक कार्यकर्ता' है। नए रिसर्च पर काम कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है वैसे तो इस तरह के वायरस से निजात दिलाने वाली थैरेपी पहले से ही मौजूद है लेकिन इस नए रिसर्च में थैरेपी को थोड़ा इलग तरह से डिजाइन किया जा रहा है जिसमें रोगी के शरीर से इस वायरस को नष्ट किया जा सके।
प्रोफेसर सारा फिडलर ने बताया कि इस वायरस के लिए हाल ही में जिस एंटी-रेट्रोवियाल थैरेपी का इस्तेमाल किया जाता है उसका मुख्य लक्ष्य सिर्फ शरीर में मौजूद टी-कोशिकाओं को ठीक करना है जो इस वायरस की वजह से संक्रमित हो जाते हैं। लेकिन इससे शरीर से वायरस पूरी तरह से नहीं हट पाता है। इसलिए इस नए थैरेपी का निर्माण किया गया जिससे इस वायरस से संक्रमित मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकें।
बता दें कि यह नई थैरेपी दो स्टेज में काम करती है। पहले यह शरीर में मौजूद एचआईवी संक्रमित कोशिकाओं की पहचान करती है। दूसरा यह एक दवा वैरिनोस्टाट के रूप में जाना जाता है जो कि निष्क्रिय टी-कोशिकाओं को सक्रिय करता है। इस तरह यह इम्यून सिस्टम को इस वायरस से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
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